सिंधिया के भाजपा प्रवेश के परदे के पीछे की कहानी

ज्योतिरादित्य सिंधिया द्वारा कांग्रेस का साथ छोड़कर भाजपा का दामन थामे जाने वाली इस सुपरहिट फिल्म की स्क्रिप्ट तो पिछले साल ही लिख दी गई थी। आप लोगों को याद होगा कि पिछले साल ही सिंधिया ने अपने टि्वटर हैंडल में लिखे अपने परिचय में से कांग्रेस का उल्लेख हटा दिया था और वक़्त- वक़्त पर कांग्रेस की विचारधारा से विपरीत बयान दे रहे थे।
आज सामने आए घटनाक्रम का सूत्रपात उस समय से पहले ही हो चुका था। दरअसल सिंधिया उस समय भाजपा के एक बड़े दिग्गज नेता अरुण जेटली (अब दिवंगत) के संपर्क में थे और जेटली के माध्यम से ही भाजपा की हाईकमान तक उन्होंने अपने दिल की बात पहुंचा दी थी। भाजपा और ज्योतिरादित्य के बीच इंडिया टीवी के सर्वे सर्वा रजत शर्मा भी महत्वपूर्ण मध्यस्थ की भूमिका अदा कर रहे थे. एक बड़े अखबार ने इस खिचड़ी पकने वाले मामले की अपनी विशेष रिपोर्ट में पुष्टि की है।
सिंधिया का ऑफर था कि भाजपा अगर उन्हें मप्र का मुख्यमंत्री बनाए तो वह कम से कम दो दर्जन विधायकों को साथ लेकर भाजपा में आ सकते हैं। एक अन्य बड़ी न्यूज़ वेबसाइट के अनुसार जेटली ने भाजपा के शीर्ष नेताओं से चर्चा कर सिंधिया को वापस यह संदेश दिया था कि उनको सीधे मुख्यमंत्री बनाना मुमकिन नहीं है, क्योंकि भाजपा के मध्यप्रदेश के दिग्गज नेता शिवराज सिंह चौहान, नरेंद्र सिंह तोमर, कैलाश विजयवर्गीय आदि इसे मंजूर नहीं करेंगे और खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष अमित शाह इसके लिए एकदम तैयार नहीं है।
जेटली ने ज्योतिरादित्य को सुझाव दिया था कि वह पहले भाजपा में शामिल हों और अपने समर्थक विधायकों से इस्तीफा दिलाकर कमलनाथ सरकार गिरवाएं। बदले में भाजपा उन्हें केंद्र में मंत्री बनाकर आगे राज्यसभा में भेज सकती है। यह वही ऑफर है जो भाजपा सिंधिया के साथ वर्तमान में अमल ला रही है. सिंधिया तभी इसके लिए तैयार हो गए थे। जेटली ने आगे इस मामले पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को राजी करने का भरोसा सिंधिया को दे दिया था।
लेकिन इसके बाद ही जेटली की तबियत बहुत ज्यादा खराब हो गई और उन्हें लंबे समय के लिए अस्पताल में भर्ती होना पड़ा था। इसके बाद तो जेटली की हालत कभी सुधरी ही नहीं और वह अपनी अस्वस्थता के साथ ही दुनिया से कूच कर गए. उनके निधन के साथ ही सिंधिया का मामला कुछ महीनों के लिए ठंडे बस्ते में चला गया था। रिपोर्ट में दावा है कि सोनिया गांधी व राहुल को सिंधिया की भाजपा से मेल मुलाकात की खबर लग गई थी इसीलिए वह उनसे मुलाकात तक करने में कतराने लगे थे। एक तो प्रदेश में पहले से ही उपेक्षा और शीर्ष नेतृत्व से अनबोले जैसी स्थिति ने सिंधिया को विचलित कर दिया और उन्होंने भाजपा के शीर्ष नेतृत्व से खुद ही आगे आकर इस बारे में चर्चा करके अपने पहले वाले ऑफर पर सेटिंग तय कर ली। दावा यह भी है कि सिंधिया ने इस मामले पर सीधे प्रधानमंत्री से भी बात की है। उसके बाद ही है यह ठोस निर्णय लिया है।
गौरतलब है कि ज्योतिरादित्य सिंधिया और अरुण जेटली के बीच बेहद घनिष्ठ रिश्ते थे। दोनों के ये रिश्ते क्रिकेट की सियासत के साथ साथ जेटली और ज्योतिरादित्य के पिता स्वर्गीय माधवराव सिंधिया के बीच गहरी दोस्ती की वजह से भी थे। साथ ही इंडिया टीवी के कर्ताधर्ता रजत शर्मा की भी इन दोनों की अक्सर मुलाकातों का कारण बनती थी।
वैसे मेरा विश्लेषण यह है कि इस मामले को कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व (जो कि सही मायने में अस्तित्व में है ही नहीं) की गैर जिम्मेदारी और इमैच्योरिटी बाले बर्ताव ने बिगाड़ा है वरना ज्योतिरादित्य सिंधिया के मामले को वक्त रहते बहुत ही आराम से संवाद स्थापित करके मैनेज किया जा सकता था. ऐसी स्थिति में अनबोला साधना तो बचकानी हरकत है, बजाय इसके ज्यादा स्वस्थ्य संवाद होना चाहिए था। पानी सिर से ऊपर निकलने पर बात करने का कोई फायदा था भी नहीं, क्योंकि एक बार सिंधिया के कदम इतने आगे निकल गए तो फिर उनके लिए इससे पीछे हटना संभव रह ही नहीं गया था।
राजकुमार खैमरिया

Post Author: Vijendra Upadhyay

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