लाल कपड़े की थैली के साथ माताजी की मजबूरी

✍🏻जितेन्द्र दुबे,देवास (मेरे व्यक्तिगत अनुभव)

देवास। मेरी ड्यूटी स्थल पर एक बुजुर्ग माताजी रोजाना एक बंद शटर वाली दुकान के ओटले पर आकर बैठ जाती थी उनके है हाथ में एक लाल कलर की कपड़े की थैली रहती थी। दो-चार दिन यह क्रम चलता रहा फिर मैंने गौर किया कि माताजी खाली थैली लेकर ही आती थी और वापस भी खाली थेली लेकर ही चली जाती थी।
मैंने एक दिन उन्हें टोका की माता जी आप यहां क्यों बैठे रहते हो उन्होंने जवाब दिया कि बेटा मैं सब्जी लेने के लिए यहां आती हूं तब मैंने कहा माता जी मैं तो आपको रोज देख रहा हूं कि आप खाली थैली लेकर ही आते हो और खाली ही वापस ले कर चले जाते हो मैं अभी सब्जी का ठेला बुलाता हूं। आप सब्जी ले लीजिए तो, माताजी थोड़ी घबरा गई और कहने लगी सब्जी नहीं चाहिए और उन्होंने घबराकर कहा कि मैं सच बताऊं तो सब्जी लेने के लिए नहीं आती हूं मैं पीछे एक सकरी गली में पीछे वाले कमरे में किराए से रहती हूं वहां पर हवा बिल्कुल नहीं आती है और मेरी तबीयत अक्सर खराब रहती है तो मैं ताजी हवा लेने के लिए इस ओटले पर आकर बैठ जाती हूं।
मैने पूछा की कुछ नहीं लेना तो फिर थैली क्यों लेकर आते हो आप
उन्होंने जवाब दिया अपने साथ कपड़े की थैली इसलिए लाती हूं ताकि कोई पुलिस वाला मेरे हाथ में थेली देखकर यह समझे कि मैं सब्जी लेने या किराना लेने आई हूं और मुझे यहां से उठाकर ना भगाए
मैं कुछ देर मोंन रहा फिर वहां से चल दिया। मुझे जो ड्यूटी पर नाश्ता मिलता था कई बार मैं और माताजी आधा-आधा कर कर खा लेते थे। यह लॉकडाउन और विपत्ति का दौर तो एक न एक दिन चला जाएगा पर कुछ यादें मेरे स्मृति पटल पर हमेशा के लिए अंकित हो जाएगी।

Post Author: Vijendra Upadhyay

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