देवास। अमलतास हॉस्पिटल के पी.आर.ओ. संजीव कुमार पंजाबी ने बताया कि गंभीर या अति गंभीर मरीजों का ऑक्सीजन लेवल कम होने की स्थिति में भी उनको अस्पताल में भर्ती किया जा रहा है। इसके बाद उन मरीजों का ऑक्सीजन लेवल धीरे – धीरे सामान्य होने लगता है। ऐसा इसलिए नहीं होता कि सभी मरीजों को ऑक्सीजन मिल जाता है। बल्कि अमलतास हॉस्पिटल में डॉक्टर की निगरानी में प्रत्येक मरीज का ऑक्सीजन मॉनीटर किया जाता है। इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता है कि किसी मरीज को कितनी ऑक्सीजन की आवश्यकता है ।
उसी आवश्यकतानुरूप ऑक्सीजन दिया जाता है, जिससे मरीज के गिरते ऑक्सीजन लेवल में स्थिरता आने लगती है और ऑक्सीजन लेवल बढ़ने लगता है। प्रायः देखा जा रहा है कि ऑक्सीजन लेवल कोविड मरीजों के इलाज में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है, किंतु ज्यादा ऑक्सीजन सप्लाई हो जाने से भी मरीजों को नुकसान होने लगता है। जैसे रिकवरी लेट होना , ऑक्सीजन टॉक्सिसिटी का होना जिसके कारण मरीज को बेचैनी होना , नींद न आना जैसे लक्षण होते हैं।
विशेषज्ञ डॉ. जगत रावत ने बताया कि सिलेंडर के ऑक्सीजन की तुलना में सेन्ट्रल पाइप लाइन ऑक्सीजन (लिक्विड ऑक्सीजन) बेहतर होती है। इसमें इंफेक्शन का खतरा भी बहुत कम रहता है। अमलतास हॉस्पिटल के चेयरमैन मयंक राजसिंह भदौरिया ने बताया कि इस समय अस्पताल में 6 टन की क्षमता वाला लिक्विड ऑक्सीजन टैंक लगा हुआ है। यहां प्रतिदिन लगभग 6 टन ऑक्सीजन की खपत हो रही है। पूरे अस्पताल में ऑक्सीजन सप्लाई हेतु तीन मल्टीफोल्ड पैनल लगते हुए हैं। जो कि सामान्य तौर पर अन्य जगह एक ही लगे रहते हैं, जिससे ऑक्सीजन की मात्रा अस्थिर बनी रहती है। अमलतास हॉस्पिटल प्रबंधन हर समय अपडेट रहने का प्रयास करता है जिससे मरीजों को सही इलाज दिया जा सके।

