घोष की उपयोगिता व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण के महान लक्ष्य में सहायक है – जितेन्द्र सिंह

देवास। समाज में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का नाम आते ही, संघ की छवि उसके घोष (बैंड) के द्वारा सहज रूप से बन जाती है। संघ की देवास नगर इकाई द्वारा नगर में पहली बार संघ के घोष का प्रात्यक्षिक कार्यक्रम प्रस्तुत किया गया। पचास से अधिक कार्यकर्ताओं ने पिछले एक माह से विभिन्न वाद्यों प्रणव, आनक, शंख, झल्लरी, वंशी एवं तूर्य पर विभिन्न रचनाओं का सामूहिक अभ्यास किया। तत्पश्चात मुखर्जी नगर में इन स्वयंसेवकों ने घोष का मनमोहक कार्यक्रम प्रस्तुत किया। सभी वाद्यों पर न्यूनतम बीस रचनाओं में सिद्ध एवं प्रशिक्षित स्वयंसेवकों ने अनुशासित एवं प्रभावी घोष वादन किया। चालीस मिनिट से अधिक चले अवनरत घोष वादन ने सभी को मुग्ध कर दिया। कार्यक्रम में जिला संघचालक माननीय मनोहर विश्वकर्मा के साथ कार्यक्रम अध्यक्ष अजय तोमर मंचस्थ थे। मुख्य वक्ता के रूप में संघ के क्षेत्र शारीरिक शिक्षण प्रमुख जितेन्द्र सिंह ने कहा कि संघ ने भारतीय संगीत को घोष के माध्यम से जनसामान्य में प्रचलित करने का अनुपम प्रयोग किया है। भारतीय संगीत मन, आत्मा और शरीर को आनंद और शांति प्रदान करता है। संघ की 1939 की सिंदी बैठक में घोष का वर्तमान स्वरूप स्वीकार किया गया, वर्तमान समय में दो सौ से अधिक भारतीय रचनाओं को संघ ने पुनर्जीवित एवं प्रचलित किया है। संघ का घोष आंतरिक प्रशिक्षण का एक भाग है। घोष का प्रयोजन भी मानसिक और शारीरिक विकास द्वारा व्यक्ति निर्माण है। अनुशासन, उत्साह, एकाग्रता एवं सांगिकता के गुणों का विकास घोष के द्वारा होता है। इसलिये घोष भी संघ के व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण का एक उपकरण है। कार्यक्रम में घोष की विभिन्न रचनाओ के प्रदर्शन के साथ ही ध्वजारोपणम्, ध्वज प्रणाम एवं ध्वजावतरण के संगत भी रचनाओं का वादन किया गया।

Post Author: Vijendra Upadhyay