रंजना चव्हाण, देवास
यू कहे कि भगवान का वरदान मिला था मुझे, जो किसी को न दिखे वो दिखा मुझे…जो किसी को न मिले वो मिला मुझे..जो बेजान है उसकी भी बोली समझ मे आई मुझे…एक दिन यू ही जा रही थी..बेखोफ मुह पर कपड़ा बांधे.. की राह में मिल गया कोरोना वायरस हाथ मे हाथ बांधे मुझे। चेहरे पर जीत की खुशी लिए हुए और सर्वशक्तिशाली का घमंड लिए हुए आकर बोला बड़े रौब से मुझे दिख नही रहा पूरी दुनिया को तबाह कर रहा हूँ और जरा डर नही लग रहा है तुझे मुझसे…मेने उसकी आँखों मे आँखे डाली और बोला जब यहां तबाह करने आ ही गए हो तो चंद बातें कर ले अपने ओर अपनो के बारे में…
मेने यह कहा कि अभी तक तो सिर्फ लोगो से ही सुना था इस बारे में आज देख लिया कोरोना तुझे…देखने लगा वो मुझे अचरच भरी नजरों से..ओर राजी हुआ अपनी हकीकत बताने में…कहने लगा बड़े अहंकारी स्वर में मेरे जन्मदाता यह स्वार्थी इंसान है।
प्रकृति संरक्षक है और जलवायु पालन हार है। इंसान ने बनाई मशीनें, मिसाइल ओर भूलता गया मानवता ओर करता रहा अपनी मनमानी और मिटाने लगा श्रर्ष्टि की सृजनता। बड़ी अकड़ कर वो बोला देख आज मेरा तमाशा चारो ओर विनाश ही विनाश है बिलक रहा संसार…सुन कर कोरोना की बाते मेरी रूह कांप उठी मेरी..की हम इतना गिर गये की सूक्ष्म जीव की हिम्मत जांग उठी। फिर हिम्मत कर मेने कराई मेरे देश की पहचान जहाँ साधु संतों की वाणी है अविराम..तो मुझे पूर्ण विश्वास है कि तुम्हारी नियत भी बदल जाएगी। मेरे देश की तपोभूमि पर तेरी चाल नही चल पायेगी।
यह सुन कोरोना मेरी मातृभूमि की शक्ति के आगे नतमस्तक सा हुआ और कहने लगा शायद तेरे ही देश मे अंत है मेरा, धन्य हो जाऊं गर में विलीन हो जाऊं तेरी इस पावन धरती पर।

