40 गांव के जरूरतमंद लोगों को लगभग 1000 कंबल का किया वितरण
देवास। पुरूलिया जिले के आनंद नगर में आनंद मार्ग यूनिवर्सल रिलीफ टीम(अमर्ट ) ग्लोबल की ओर से समीपस्थ लगभग 40 गांव के के जरूरतमंद लोगों को लगभग 1000 (एक हजार) कंबल का वितरण किया गया। आचार्य ह्रदयेश ब्रह्मचारी ने बताया कि प्रतिवर्षानुसार इस वर्ष भी लगभग 10 हजार से अधिक आनंदमार्गियो आध्यात्मिकता लाभ लिया एवं आनंद मार्ग के पुरोधा प्रमुख आचार्य विश्वदेवानंद अवधूत ने उद्धार कार्यक्रम का शुभारंभ फीता काटकर किया। मौके पर आनंदमार्ग के जनरल सेक्रेटरी आचार्य श्री चितस्वरूपानंद अवधूत, आचार्य मधुब्रतानंद अवधूत,आचार्य अनिर्वानानंद अवधूत समेत अनेक केंद्रीय कार्यकारिणी के सदस्य उपस्थित थे। बाबा श्री श्री आनंदमूर्ति जी के निर्देशानुसार सन1965 में आनंदमार्ग यूनिवर्सल रिलीफ टीम की स्थापना की तब से आनंदमार्ग यूनिवर्सल रिलीफ टीम लगभग 160 देशों में सराहनीय कार्य करते हुए संयुक्त राष्ट्र संघ से मान्यता प्राप्त कर चुका है।
आनंद मार्ग धर्म महासम्मेलन के तीसरे दिन संस्था के संरचनात्मक ढांचे में स्थित भुक्ति प्रधान, स्थानीय पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं एवं एसीबी आदि गृहस्थ स्वयंसेवकों की महत्वपूर्ण बैठक हुई जिसकी अध्यक्षता संगठन के जनरल सेक्रेटरी आचार्य चितस्वरूपानंद अवधूत ने की। संध्या काल में एक गीति नाटक प्रस्तुत की गई जिसमें रीवा रांची के कलाकारों ने सामाजिक उत्सव एवं विभिन्न सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों के विकृत समझने एवं इन उत्सव को शास्त्रीय रूप देने का प्रयास किया। देवास जिले के भुक्ति प्रधान दीपसिंह तंवर ने बताया कि संघ के पुरोधा प्रमुख श्रद्धेय आचार्य विश्वदेवानंद अवधूत ने बाबा भक्तों को संबोधित करते हुए कहा कि पुरुषोत्तम विश्व के प्राण केंद्र हैं। हर प्राणी जीव- जंतु, पशु-पक्षी, लता- गुल्म के साथ व्यक्तिगत रूप से जुड़े रहते इसे कहते हैं ओत योग। परमपुरुष सभी सत्ताओं के साथ समष्टिगत भाव से जुड़े रहते हैं उसे ही कहते हैं प्रोत योग। परम पुरुष के इस अंतरंग संबंध को भक्त लोग ही अनुभव करते हैं। पुरोधा प्रमुख जी ने कहा कि भक्त तीन प्रकार के होते हैं। प्रथम प्रकार के साधक कहते हैं की परम पुरुष सबके हैं इसलिए मेरे भी हैं, ऐसा मनोभाव रखने वाले भक्त अधम श्रेणी में आएंगे। परम पुरुष मेरे भी हैं और अन्य सभी जीवो के भी हैं, ऐसे भक्त मध्यम श्रेणी के हैं। अव्वल दर्जे के भक्त कहते हैं कि परम पुरुष मेरे हैं और सिर्फ मेरे हैं, वे मेरे परम संपत्ति है। आचार्य जी ने कहा की भक्ति पाने के लिए नैतिक नियमो का पालन करना होगा । अहिंसा ,सत्य ,अस्तेय ब्रह्मचर्य, शौच, संतोष ,तप स्वाध्याय ,ईश्वर प्रणिधान के पालन से मन निर्मल होता है। इस निर्मल मन से जब इष्ट का ध्यान किया जाता है तो भक्ति सहज उपलब्ध हो जाता है। उक्त जानकारी हेमेन्द्र निगम ने दी।

