शिक्षकों ने स्कूल की दशा बदली, स्कूल को बनाया मॉडल स्कूल
देवास 9 मई 2020/कौन कहता है आसमाँ में सुराख हो नहीं सकता, एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारों। कवि दुष्यंत कुमार की इन्हीं पंक्तियों को अपना ध्येय वाक्य बनाकर शिक्षक परमानंद पिपलोदिया और विक्रम सौलंकी ने गांव के बच्चों का भविष्य संवारने का कार्य किया। शासकीय सेटेलाइट शाला भोपापुरा जनशिक्षा केन्द्र आमलाताज संकुल शा. उ. मा. वि. देवगढ विकास खंड बागली जिला देवास को संवारने का लक्ष्य दोनों शिक्षकों ने बनाया।
कोई भी व्यक्ति जब सेवा में आता हैं तो वह उत्साह, आनंद से लबरेज होता हैं लेकिन बड़ी बात उसी साहस, उत्साह, समर्पण, सामर्थ्य को बनाये रखने की होती है। जब परमानंद पिपलोदिया अपनी शाला को ज्वाइनिंग करने पहुँचे तो देखा कि उनकी पहली पोस्टिंग जिस विद्यालय में हो रहीं हैं वहां न खिड़की हैं, न दरवाजे, जर्जर शौचालय, उखड़ा फर्श, सालों से रंगों को तरसती दीवारें, और स्कूल के दालान में बंधे पशु, घुड़े (गोबर) किसी का भी हौंसला गिरा सकते थे। लेकिन अक्सर शिक्षक विहीन शालायें ऐसी ही होती है। बिना एक पल की देर लगाए शिक्षक परमानंद पिपलोदिया लग गए इस रंगविहीन तस्वीर को रंगीन बनाने में।
शिक्षकों ने बताया कि सबसे पहले दोनों शिक्षकों ने मिलकर योजना बनाई की इस स्कूल को संवारा जाए। उन्होंने पाया कि इस दुर्दशा के जिम्मेदार यहां के लोग भी कम नही है इसलिए तस्वीर बदलने के लिए उनका साथ जरूरी हैं, पहले ही दिन पहुंच गए गांव में लोगों से मिलने और समस्याओं के निराकरण के लिए उन्हें साथ अपने साथ मिलाया। उन्हें जानकर आश्चर्य हुआ कि शिक्षा का स्तर शून्य से थोड़ा ही बड़ा है, और लोग हिंदी भी नही बोलते हैं। बंजारा समाज के लोग हैं और सबसे बड़ी बात उस गांव में ही नहीं आसपास के गांवों में भी टावर नहीं होने से मोबाइल भी नहीं लगा सकते। सभी लोगों के विचार जान दोनों शिक्षक शिक्षा का महत्व बताकर, विद्यालय आये। गांव की सबसे बड़ी कमी थी शिक्षा के प्रति नकारात्मक रवैया और गरीबी।
पहला निदान परमानंद पिपलोदिया ने इसी समस्या का किया कि आज के बाद आपको सिर्फ बच्चों को विद्यालय भेजना हैं उनको शिक्षण सामग्री उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी विद्यालय परिवार की। दूसरे ही दिन दोनों शिक्षक साथी मिलकर शैक्षणिक सामग्री लाये जिसमें कॉपियां, ड्राइंग बुक, स्केच पेन पैकेट, स्लेट, पेम,पेंसिल, इरेजर, शार्पनर पेन,कंपास और बैग। इन सब सामग्रियों को पहली बार देख बच्चे नाच उठे और वायदा किया अपने शिक्षकों से कि वह प्रतिदिन शाला आएंगे। पाठ्यपुस्तक सरकार देती ही है अन्य सामग्री विद्यालय ने दे दी अब बचा था उन्हें पढ़ाने के लिए जी जान से जुटना। और दोनों शिक्षक बिना कोई विलंब किये प्रतिदिन शाला जाने लगे टाइम टेबल के अनुसार पढ़ाई होने लगी,बच्चे सीखने लगें, पालको को संतुष्टि हुई और विश्वास जगा कि गांव का भविष्य सुरक्षित हाथों में है तो वह भी अब सहयोग को आगे आने लगे।
मेहनत रंग लाने लगी इनके जाने के बाद बच्चे फर्राटे से गिनती, पहाड़े, स्पेलिंग्स, सुनाने लगे।
शैक्षणिक समस्या निपटी तो दूसरी समस्या थी पालकों द्वारा बच्चों को अपने साथ खेत पर ले जाना,बकरियों को चराने भेज देना या छोटे भाई बहनों को रखने के लिए घर ही रख लेना। इससे निपटने के लिए परमानंद पिपलोदिया और विक्रम सोलंकी प्रतिदिन अनुपस्थित बच्चों के घर जाने लगे पालकों समझाकर, निवेदन कर और शिक्षा का महत्व बताकर उन्हें विद्यालय भेजने के उनके आग्रह काम करने लगें। फिर भी कई बार बच्चों को वो खेत से भी मोटरसाइकिल से लाने लगें। परमानंद पिपलोदिया की मिलनसारिता, विनम्रता, नेतृत्व क्षमता से जंहा लोग प्रभावित थे ।इसी की बदौलत लोगों ने उनके कहने पर विद्यालय के मैदान में पशु बांधने बन्द किये अपने घूरे व खाद के ढेर हटाये। विद्यालय कंटीजेंसी राशि के अलावा भी दोनों शिक्षक साथियों ने स्वयं के साथ साथ ही हाटपीपल्या के दानदाताओ से भी विद्यालय में अध्ययन रत बच्चों के लिए लोगो से शैक्षणिक सामग्री दान करने की अपील की। कई दानदाताओ ने स्वेटर दी,कइयों ने बेग, कइयों ने विभिन्न प्रकार की सामग्रियों को दान किया। इसी की वजह से भोपापुरा स्कूल में छात्रों को बॉडी लोशन, साबुन, पाउडर, तेल, कंघी, रबर,चिमटी सहित रोजमर्रा की सभी चीजें निशुल्क उपलब्ध हमेशा रहती है। बेहतरीन ड्रेस पहने, टाई लगाये, बच्चों को जब निरीक्षण कर्ता देखते तो चौंक पड़ते कि वाह इसे कहते हैं काम।वही विक्रम सोलंकी जी की गणित में शिक्षण की रोचक विधियों की बदौलत बड़े बड़े सवाल चुटकियों में हल करने लगें। 60 तक पहाड़े जब दूसरी का बच्चा सुनाता तो निरीक्षण कर्ता भी दंग रह जाते। निरीक्षण के दौरान जब जनशिक्षक साथी उनकी शैक्षणिक उत्कृष्टता देखते तो हर्षविभोर होकर अन्य विद्यालयों को भी शाला का उदाहरण देकर प्रेरित करने लगे। विद्यालय का नाम चला शैक्षणिक गतिविधियों के साथ साथ ही विद्यालय में हर महापुरुषों की जयन्ती मनाई जाने लगी, खेलकूद ,वाद विवाद, ड्राइंग, मेंहदी, रस्सीकूद, चेयर रेस, जैसे पारम्परिक खेलों के साथ साथ ही मिट्टी के बर्तन साफ सफाई, जल संरक्षण जैसी कई मुहिम चलाई गई। विद्यालय में एक कक्ष होने के बावजूद आज बिल्डिंग, बेहतरीन बोर्ड, फर्श शौचालय सभी की मरम्मत की गई। जनसहयोग से अभी तार फेंसिंग भी करा दी गई। शिक्षण में दोनों साथियो को जब भी लगता है रविवार को भी कक्षा लगाते हैं। परमानंद जी जैसे प्रधानध्यापक हो तो कोई भी विद्यालय अपनी सफलता की कहानी लिख सकता हैं। इसी की बदौलत आज गांव का एक भी बच्चा किसी भी प्राइवेट स्कूल में नहीं जाता हैं। हाटपीपल्या के सभी दैनिक अखबारों में समय समय पर विद्यालय गतिविधियों की खबरें आती रहती हैं। अभी 2018 में गणित शिक्षण विधियों का बेहतरीन वीडियो जिला पंचायत के माध्यम से बनाने में श्री विक्रम सोलंकी का चयन हो चुका है। परमानंद पिपलोदिया जी का चयन भी कई बार श्रेष्ठ शिक्षण सहायक सामग्री के लिए हुआ है।अभी हाल ही में भी शिक्षा में शून्य नवाचार में उन्हें देवास में सम्मानित किया। अभी कोरोना जैसी भयंकर महामारी में दोनों शिक्षक साथियों ने मास्क तथा डेटोल साबुन का वितरण किया गया और लोगो को घरो में ही रहने की सलाह दी गई एक मीटर की दूरी बनाकर रखे तथा गर्म पेय पदार्थो का सेवन करे ।
इस विद्यालय की सफलता की कहानी का राज हैं शिक्षक साथियों का दृढ़ निश्चय, संकल्प, समर्पण, अपने कार्य से प्रेम, राष्ट्र निर्माण में सुनिश्चित भागीदारी, बेहतरीन शिक्षण, सतत संपर्क, बालमन को समझना तथा शिक्षा में आ रही रुकावटों का उचित समाधान। वर्तमान में भी DIGI-LEP के माध्यम से अध्यापन कार्य किया जा रहा है। यदि हर शिक्षक परमानंद पिपलोदिया और विक्रम सोलंकी की तरह हो जाये तो हर शाला एक मिसाल बने।

