सिद्धिविनायक ने छोड़ा चोला, अब मूल स्वरूप में देंगे दर्शन

  • आशीष देवांग, पत्रकार
    देवास। शहर के नागदा क्षेत्र में विराजित श्री सिद्धिविनायक भगवान गणेश ने शनिवार को चोला छोड़ दिया है। गणेश प्रकट उत्सव (गणेश स्थापना दिवस) के 14 दिन पहले भगवान गणेश प्रतिमा का चोला छोड़ना अति शुभ माना जा रहा है। बताया जा रहा है कि 14 दिन बाद गणेश स्थापना दिवस है, जिसमें सैकड़ों की तादाद में भक्तगण दर्शन करने आते हैं। अब भगवान का पूर्ण चोला उतारकर सुव्यवस्थित रुप से विधि-विधान पूर्वक नवीन चोला चढ़ाया जाएगा। इसके बाद भगवान श्री सिद्धिविनायक अपने मूल स्वरूप में दर्शन देंगे। 14 दिन की तैयारी का अवसर भी मिल गया है, जिसके बाद नागदा गणेश मंदिर पर धूमधाम से गणेश उत्सव मनाया जाएगा।
    नागदा गणेश मंदिर के पुजारी मनीष दुबे का कहना है कि शनिवार यानी 8 अगस्त को वे भगवान श्री गणेश के 11 हजार जप पूर्ण कर रहे थे, तभी एक गर्जना की आवाज आई और मंदिर में कुछ गिरने की आवाज आई। जब मंदिर में जाकर देखा तो भगवान का चोला छुटा नजर आया। इसके बाद मंदिर के भक्तों व विद्वान पंडितों को जानकारी दी गई। विद्वानों का कहना था कि 100 वर्ष में एक बार प्राचीन व चैतन्य प्रतिमाएं चोला छोड़ती है, जिसके बाद भगवान एक बार फिर मूल स्वरूप में दर्शन देते हैं।
  • बताया जा रहा है कि अब प्रतिमा पर नया चोला चढ़ाया जाएगा और छोड़े गए चोले का नर्मदा नदी में विसर्जन किया जाएगा। चोला छोड़ने की जानकारी लगते ही प्रदेश कांग्रेस महामंत्री प्रदीप चौधरी मौके पर पहुंचे और उन्होंने तुरंत पंडितों की टीम बनाकर गणेश जी के श्रृंगार की तैयारियां शुरू करवा दी। श्री चौधरी का कहना है कि भगवान गणेश ने हमें 14 दिन का समय दिया है। उन्होंने शनिवार को चोला छोड़ा है और 22 तारीख को भी शनिवार है जिस दिन गणेश स्थापना का दिन है। इस दिन से भगवान श्री सिद्धिविनायक का पूजन धूमधाम से प्रारंभ कर दिया जाएगा। शहर में सुख-शांति-समृद्धि की कामना लिए हवन-पूजन भी प्रारंभ किया जाएगा। गणेश विसर्जन के दिन यहां 1100 लड्डुओं की आहुतियां भी दी जाएगी। प्रतिदिन अथर्वशीर्ष पाठ किए जाएंगे।
    वैज्ञानिक पहलू:- देश में अन्य प्रतिमाओं के चोला छोड़ने पर वैज्ञानिक भी अपनी राय रख चुके हैं। वह मानते हैं कि लगातार सिंदूर चढ़ाने से सिंदूर की मोटी परत बन जाती है और जब यह अंदर से सूखने लगती है जिसके कारण सिंदूर की परत टूटकर गिर जाती है। वहीं पौराणिक कथा व ग्रन्थों में चोला छोड़ने की प्रक्रिया को आस्था से जोड़कर देखा जाता है। विद्वानों का मत है कि जिस तरह हम वस्त्र बदलते हैं उसी तरह भगवान की प्रतिमाएं भी वस्त्र बदलने का कार्य करती है। वह वस्त्र रूपी चोला छोड़ देते है और नए वस्त्र धारण कर लेते हैं।

Post Author: Vijendra Upadhyay