“राम” को काल्पनिक बोलने वाले अब “ज्ञानवापी” पर ज्ञान पेल रहे है…

सालो से सत्ता में रही कुछ राजनीतिक दल एक समय राम को काल्पनिक कहते थे, क्योकि उन्हें वोट बैंक की चिंता हमेशा से रही है। इस चिंता में उन्होंने अपने अस्तित्व, अपने स्वाभिमान, अपनी संस्कृति को भी दाव पर लगा दिया।
यही नहीं राजनीति दलों ने अपने वोट बैंक को खुश करने के लिये भगवान राम के अस्तित्व को ही नकार दिया था और भगवान राम को काल्पनिक सिद्ध करने में लग गए थे।

बाद में अयोध्या राम मंदिर का फैसला आया तो वही राजनीतिक दल के नेताओ ने भगवा धारण कर खुद को हिन्दू साबित करने में भी कोई कसर न छोड़ी। कह सकते है कि गिरगिट की तरह अपना रंग फिर बदल दिया था।

आज वर्तमान में ज्ञानवापी का मसला चल रहा है। हर भारतीय को आज उसकी सच्चाई पता पड़ गयी है। देश मे ऐसे कितने ही मंदिर है जहाँ मुगलों ने कब्जा कर उसे मस्जिद में बदला है। यह आज़ादी के बाद रही तत्कालीन सरकार को भी पता थी और आज की वर्तमान सरकार को भी पता है।
बस पिछली सरकारों का मुस्लिम वोटरों से मोह नहीं छूट पा रहा था। जिसके लिये आज भी हिंदुओ को अपने अधिकार के लिये न्यायालय का दरवाजा खटखटाना पड़ रहा है।
सच्चाई यह भी है कि आजादी के बाद लालच के कारण देश को विभाजित किया गया।
तब सवाल यह भी उठा कि जब पाकिस्तान इस्लामिक देश बना तो, फिर भारत को हिन्दू राष्ट्र क्यो नहीं घोषित किया गया?
भारत को धर्मनिरपेक्ष देश ही क्यो बनाया गया?
देखा जाए तो भारत 1947 मे आज़ाद तो गया था लेकिन यह भी सच है कि वह सेक्युलर सोच का गुलाम भी हो गया था।
आज कितने ही भारतीयों को इन सब बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता है, क्योकि उन्हें धर्म, मंदिर- मस्जिद से कोई लेना देना नहीं है। क्योकि वह सिर्फ अभी रुपिया कमाने में लगे है।
उदाहरण के तौर पर हम देख सकते है कि ऐसे कितने ही देश थे जिन्होंने सिर्फ अपनी आर्थिक स्थिति के लिए काम किया बाद में उन्हीं देशों का अस्तित्व ही मिट गया है।
इसलिय हमारे देश की मिट्टी, हमारे अस्तित्व, हमारी संस्कृति से सभी को प्यार होंना चाहिए। उसके लिये जीना भी चाहिए।

आज हम आज़ादी के 75 साल का अमृत उत्सव बना रहे है। फिर भी देश की राजनीति आज भी अपने स्वार्थ के लिये ही काम कर रही है। अपने स्वार्थ के मद्देनजर राजनीति दलों ने जातिवाद और समाजवाद को ऊपर रखा। सभी के लिये राष्ट्रसेवा पहले होना चाहिए बाद में धर्म, लेकिन यह सिर्फ एक तरफ ही क्यो लागू होता है?
यह आज तक किसी को समझ नहीं आया। यदि भारत धर्मनिरपेक्ष देश है तो सिर्फ हिंदुओ को ही हमेशा समझौता क्यो करना पड़ता है?
आज यदि हिंदुओ ने अपने अस्तित्व, अपने मंदिरों की लड़ाई फिर से शुरू की तो उसमें गलत क्या है?
सभी को अपने अधिकार की लड़ाई लड़ने का पूरा -पूरा हक है।
ऐसे में यदि हिंदुओ का पक्ष मजबूत होता है तो किसी को इस पर टिका टिप्पणी करने का भी अधिकार नहीं है। उसी प्रकार ज्ञानवापी के मसले में भी किसी को ज्ञान देने की आवश्यकता नही है। यदि भाईचारा ही निभाना है तो मुस्लिम पक्ष को खुद ही ऐसे मंदिर जहां पर वर्षों से कब्जा है, उन्हें खुद ही हिंदुपक्ष को सौप देना चाहिए।
भारतवर्ष युगों – युगों से सन्तो की धरती रही है। यह वह तमोभूमि है जहाँ भगवान ने अलग – अलग रूप में अवतार लिए है ओर दुष्टो का संहार किया है। भारत की इस तपोभूमि पर कितने ही अवतारी पुरुषों ने जन्म लिया है। उन्होंने समय – समय पर धर्म की पताका भी लहराई है। यह क्रम आगे भी चलता रहेगा, बस हमे उन्हें पहचानना है और उनके साथ मजबूती से खड़े रहना है।

विजेंद्र उपाध्याय, देवास

Post Author: Vijendra Upadhyay